गणेश चतुर्थी त्यौहार उत्सव - इतिहास और महत्व

ganesh chaturthi

भारत में गणेश चतुर्थी का त्योहार बड़े ही हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है परंतु महाराष्ट्र में गणेश चतुर्थी पर कुछ अलग ही नजारा देखने को मिलता है। यह गणेश चतुर्थी भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी को मनाई जाती है। भाद्रपद का महीना अगस्त के अंत या सितंबर के आरंभ में शुरू होता है। आज इस त्यौहार का महत्व इतिहास और इससे जुड़ी कुछ पौराणिक कथाओं के बारे में हम विचार-विमर्श करेंगे।

गणेश चतुर्थी का त्योहार

11 दिनों तक की अवधि तक चलने वाला यह त्योहार पूरे महाराष्ट्र को अलग-अलग रंगों से सजा देता है। इस साल 22 अगस्त 2020 से यह त्यौहार पूरे महाराष्ट्र के साथ-साथ पूरे भारत के प्रत्येक राज्य में मूर्ति स्थापना के साथ प्रारंभ हो जाएगा जिसके बाद मूर्ति विसर्जन अनंत चतुर्दशी के दिन जो 1 सितंबर को होगा। हिंदुओं के त्योहारों में सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण माना जाने वाला गणेश चतुर्थी का यह त्यौहार विनायक चतुर्थी के नाम से भी प्रसिद्ध है। जिसमें गणेश चतुर्थी के दिन भगवान गणेश की एक सुंदर सी प्रतिमा लाकर घर में विराजमान की जाती है। भक्त अपनी श्रद्धा के अनुसार उन्हें घर में रखते हैं और बड़े ही श्रद्धा भक्ति से उनकी सेवा करते हैं। कुछ लोग गणेश जी की प्रतिमा 1 दिन के लिए अपने घर में रखते हैं कुछ 2 दिन के लिए और कुछ तो लगातार 11 दिनों तक बड़े ही भक्ति भाव से उनकी पूजा वंदना करते हैं। पूजन के अंतिम दिन गणेश जी की मूर्ति का विसर्जन बहते जल में कर दिया जाता है।

गणेश चतुर्थी का इतिहास

गणेश चतुर्थी को लेकर बहुत सी पौराणिक कथाएं ऐसी हैं जिन पर विद्वान आज भी मंथन करते रहते हैं। जिसमें सबसे ज्यादा प्रचलित कथा भगवान शंकर माता पार्वती और भगवान गणेश के जन्म से जुड़ी हुई है। पौराणिक कथा के अनुसार एक बार की बात है जब भगवान शंकर स्नान करने कैलाश पर्वत से चलकर भोगावती नामक स्थान पर पहुंच गए थे। उस समय माता पार्वती जब कैलाश पर्वत पर अकेली थी तो भगवान शंकर के जाने के बाद पार्वती माता भी स्नान करने के लिए जाने लगी तब उन्होंने अपने तन के मैल को निकाल कर एक पुतला तैयार किया और उसमें प्राण डाल दिए। तब उसका नाम माता पार्वती ने गणेश रख दिया। उन्होंने उसे अपना पुत्र बना लिया और दरवाजे के बाहर खड़ा कर दिया और उसे कहा कि तुम द्वार पर पहरा दो मैं भीतर स्नान कर रही हूं ध्यान रहे जब तक मैं स्नान ना कर लू तब तक तो किसी को भी अंदर आने मत देना। गणेश ने माता पार्वती का कहना मान कर दरवाजे पर पहरा देना प्रारंभ कर दिया। तभी कुछ समय पश्चात भगवान शिव वहां पर आ गए और उन्होंने अंदर प्रवेश करना चाहा।

माता पार्वती की आज्ञा के अनुसार भगवान गणेश ने भगवान शिव को वहीं रोक दिया और अंदर जाने से मना कर दिया। भगवान शिव ने उनसे अंदर ना जाने का कारण पूछा तो गणेश जी ने कहा कि उनकी माता ने उन्हें कहा है कि जब तक उनकी आज्ञा ना हो तब तक किसी को अंदर ना आने दिया जाए। भगवान शिव ने इसे अपना अपमान समझा और गुस्से में आकर अपने त्रिशूल को हाथ में उठाया और गणेश का सिर धड़ से अलग कर दिया। माता पार्वती को जैसे ही यह बात पता चली वे बहुत दुखी हुई और जोर-जोर से विलाप करने लगी। माता पार्वती के विलाप को देखकर भगवान शिव ने उस बालक को पुनर्जीवित करने का वरदान दिया तब हाथी के बच्चे का सिर काट कर उस बालक के धड़ पर लगाकर उसे पुनर्जीवित कर दिया। उसी घटना के बाद भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी के दिन को गणेश चतुर्थी के रूप में मनाया जाने लगा।

मुंबई में गणेश चतुर्थी

मुंबई के प्रत्येक स्थान पर गणेश चतुर्थी को बेहद भव्यता से मनाया जाता है। मुंबई में गणेश चतुर्थी के त्योहार की शुरुआत मराठा शासक शिवाजी राजे ने अपने साम्राज्य के दौरान की थी। हालांकि मुंबई में यह त्यौहार लोकप्रिय तब हुआ जब लोकमान्य तिलक ने इसे सार्वजनिक आयोजन के रूप में मनाने के लिए लोगों को प्रोत्साहित किया। उस समय आजादी की लड़ाई भी चल रही थी और उनका इस त्योहार को सार्वजनिक रूप में मनाने का मुख्य उद्देश्य ब्रिटिश शासकों के खिलाफ लोगों को एकजुट होकर सभी धर्मों को एक साथ त्योहार मनाने के लिए प्रेरित किया।

उसके बाद से ही मुंबई के विभिन्न स्थानों पर गणेश चतुर्थी का त्योहार बड़े पैमाने पर मनाया जाता है। लोगों की स्वास्थ्य समृद्धि और खुशहाली के प्रतीक गणेश चतुर्थी के त्योहार को मुंबई में बड़े पैमाने पर मनाया जाता है और हजारों पंडाल सजा कर उनमें गणेश जी की प्रतिमा स्थापित की जाती है। लगातार 11 दिन तक गीत, भजन, नाच और गायन के जरिए बहुत धूमधाम से इस त्यौहार की रौनक लगाई जाती है। मुंबई में पांच सबसे ज्यादा मशहूर गणेश मंडल हैं जो संयुक्त रूप से एक लाख से भी ज्यादा भक्तों के साथ इस पर्व को मनाते हैं। भारत के अन्य राज्यों और क्षेत्रों से ज्यादा भव्य रूप में गणेश चतुर्थी का त्योहार मई में मनाया जाता है।

सिद्धिविनायक मंदिर

मुंबई में उपस्थित सिद्धिविनायक मंदिर जो मुंबई का सबसे लोकप्रिय मंदिर माना जाता है पूरे साल यहां भक्तों की भीड़ रहती है। गणेश चतुर्थी के उपलक्ष्य में इस दिन इस मंदिर में लाखों श्रद्धालु भगवान के दर्शन करने और अपनी मनोकामना को भगवान गणेश तक पहुंचाने के लिए मंदिर में पहुंचते हैं।

गणेश जी की पूजा के लिए आवश्यक सामग्री

गणेश चतुर्थी पर भगवान गणेश की पूजा बड़े ही श्रद्धा भक्ति भाव के साथ की जाती है जिसमें विभिन्न प्रकार की पूजन सामग्री भी शामिल की जाती है। शुद्ध जल, दूध, दही, शहद, घी, चीनी, पंचामृत, वस्त्र, जनेऊ, मधुपर्क, सुगंध, चंदन, रोली सिंदूर, बेलपत्र, दूब, शमी पत्र, गुलाल, आभूषण, सुगंधित तेल, फूल माला, चावल, धूपबत्ती, प्रसाद, फल, गंगाजल, दीपक, पान सुपारी, रुई और कपूर। भगवान गणेश को मोदक बहुत ही प्रिय हैं इसलिए भगवान गणेश को जितने भी दिन घर में रखा जाता है उन्हें मोदक का भोग भी लगाया जाता है। भक्तों के द्वारा भगवान गणेश को विभिन्न प्रकार के पकवान बनाकर रिझाने और अपनी मनोकामना पूरी करने के सभी जतन किए जाते हैं। सभी देवताओं में सर्वप्रथम पूजनीय भगवान गणेश भी अपने भक्तों की लाज सदैव रखते हैं और उनकी मनोकामनाएं पूरी करते हैं। प्रत्येक वर्ष महाराष्ट्र के साथ-साथ अन्य राज्यों में भी गणेश चतुर्थी की धूम देखी जा सकती है। जिसमें लोग नए-नए वस्त्र धारण कर कर विभिन्न प्रकार के पकवान बनाते हैं और भगवान गणेश को भोग लगाते हैं और साथ ही भजन गाकर नाच गाना करके इस पर्व को बड़े ही हर्षोल्लास के साथ प्रत्येक वर्ष मनाते हैं।

लेखिका का परिचय

मैं चारु, मुझे बचपन से ही भारत की संस्कृति से बहुत लगाव है भारत की संस्कृति के बारे में जानना भारत के विभिन्न स्थानों पर घूमना मुझे बहुत पसंद है। मैं भारत के अब तक बहुत सारे स्थानों की यात्रा कर चुकी हूं मेरा अनुभव सिर्फ यही कहता है कि भारत एक ऐसा देश है जो इस पृथ्वी पर सबसे ज्यादा खूबसूरत है। आरंभ से ही पढ़ाई लिखाई में रुचि होने के कारण मैं बड़े होकर एक अध्यापिका बनी। मुझे लेख लिखने का भी बहुत ज्यादा शौक था इसीलिए आज मैं एक लेखिका भी हूं आज मै बहुत सारी ज्ञानवर्धक वेबसाइट के लिए विभिन्न प्रकार के लेख लिखना पसंद करती हूँ।

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