तीज पर्व - अखा तीज, कजरी तीज, हरतालिका तीज क्यों मनाई जाती है

तीज पर्व के दिन खास कर सुहागन स्त्रियां अखंड सौभाग्यवती रहने के लिए विशेष तौर पर भगवान शिव और माता पार्वती की पूजा अर्चना करती हैं|

तीज का पर्व कब मनाया जाता है

मुख्य रूप से साल भर में तीन तीज का पर्व होता है - अखा, कजरी और हरतालिका
अखा तीज या अक्षय तृतीया - हर साल वैसाख महीने के शुक्ल पक्ष के तृतीया तिथि में मनाया जाता है|
कजरी तीज - हर साल भाद्रपद महीने के कृष्ण पक्ष के तृतीया तिथि को मनाया जाता है|
हरतालिका तीज - हर साल भाद्रपद महीने के शुक्ल पक्ष के तृतीया तिथि को मनाया जाता है|

अखा तीज या अक्षय तृतीया

अखा तीज अक्षय तृतीया नाम से ज्यादा प्रचलित है| अक्षय तृतीया हर साल वैसाख महीने के शुक्ल पक्ष के तृतीया तिथि में मनाया जाता है| यह दिन नए काम शुरू करने के लिए, विवाह और सोना खरीदने के लिए काफी शुभ माना गया है|

कजरी तीज या कजली तीज

कजरी तीज को कजली तीज या सातुड़ी तीज नाम से भी जाना जाता है| कजरी तीज हर साल भाद्रपद महीने के कृष्ण पक्ष के तृतीया तिथि को मनाया जाता है| इस दिन भगवान शिव और माता पार्वती की पूजा के साथ साथ श्रृंगार का भी बहुत अधिक महत्व है|

हरतालिका तीज क्या है?

हरतालिका तीज को तीजा के नाम भी जाना जाता है| हरतालिका तीज हर साल भाद्रपद महीने के शुक्ल पक्ष के तृतीया तिथि को मनाया जाता है| हरतालिका तीज विशेष तौर पर पूर्वी उत्तर प्रदेश और बिहार में मनाया जाता है| नवविवाहिता इस पर्व को धूमधाम से मनाती है| विशेष रूप से शिव पार्वती का पूजन करती हैं| तीज के एक दिन पहले नवविवाहिता के द्वारा गंगा नदी या तालाब से भगवान की प्रतिमा बनाने के लिए बालू, रेत या काली मिट्टी लायी जाती है| सभी सुहागन स्त्रियां सवेरे उठ कर नहा धोकर नए वस्त्र पहन कर सोलह श्रृंगार करती है| इस दिन छोटी सी चौकी के ऊपर केले के पत्ते से मंडप बनाया जाता है उसमे भगवान शिव, माता पार्वती और गणेश जी की बालू,रेत या काली मिट्टी की प्रतिमा बनायीं जाती है| भगवान शिव को धोती और अंगोछा और माता पार्वती को वस्त्र एवं सुहाग संबंधित सभी सामान अर्पित किया जाता है| विभिन्न प्रकार के फल, फूल और नमक रहित मिठाई और पकवान खास कर पुआ और गुजिया भगवान को अर्पित किया जाता है| इस पर्व में रात्रि भर जागते हुए तीन बार आरती भी किया जाता है| खास कर नवविवाहिता के प्रथम पूजन में उसके भाई और देवर के द्वारा चौड़ा भी नमाया जाता है| श्री पूजन के दौरान रात्रि भर नवविवाहिता माता पार्वती को सिंदूर अर्पित करती रहती हैं| यह सिंदूर बाद में जीवनपर्यन्त अपने मांग में लगाती है| रात भर गीत वगैरह गाया जाता है| पंडित जी विधि पूर्वक पूजा अर्चना करवाते हैं और शिव पार्वती के मिलान और विवाह की कथा भी सुनते हैं| सभी सुहागन स्त्रियां इस दिन निर्जला और निराहार उपवास रखती हैं और अगले दिन सुबह भगवान के पूजनोपरांत उस मंडप को नदी या तालाब में प्रवाहित करने के बाद पंडित जी को दान दक्षिणा देने के बाद बड़े बुजुर्गों का आशीर्वाद प्राप्त करने के बाद अपना व्रत तोड़ती हैं|

हरतालिका तीज नाम क्यों पड़ा?

हरित और तालिका की संधि से हरतालिका शब्द बना जिसमे हरित का मतलब है हरण करना और तालिका का मतलब होता है सखी या सहेली| यानि की सखियों के द्वारा हरण कहा जाता है की माता पार्वती भगवान शिव से विवाह करने के लिए कठोर तपस्या कर रही थी| उनकी इस तपस्या को विघ्नरहित रखने के लिए उनकी सखियों ने उनका हरण करके वन में ले गयी थी| जिस वजह से भगवान शिव और माता पार्वती के विवाह संभव हो सका था|

हरतालिका तीज की पौराणिक कथा

भगवान शिव और माता पार्वती के पुनर्मिलन के उपलक्ष्य में हरतालिका तीज पर्व मनाया जाता है पौराणिक कथाओं के अनुसार माता पार्वती को भगवान शिव को पति के रूप में पाने के लिए कठोरतम तप करना पड़ा था| १०८वें जन्म में माता पार्वती ने हिमालय पर गंगा तट पर भूखे प्यासे रह कर कठिन तपस्या कर रही थी उनकी यह स्थिति देख कर उनके पिता हिमालय ने नारद मुनि के कहने पर माता पार्वती का विवाह भगवान विष्णु से करने को तैयार हो गये थे| यह जानकर माता पार्वती को काफी दुःख हुआ| उनकी इस समस्या के निवारण के लिए उनकी सखियों ने राजमहल से माता पार्वती का हरण करके वन में लेकर चली गयी जिससे की माता पार्वती की तपस्या में कोई विघ्न नहीं आये| वन में माता पार्वती तपस्या में पुनः लीन हो गयी| इस तपस्या के क्रम में भाद्रपद के शुक्ल पक्ष के तृतीया तिथि के हस्त नक्षत्र में माता पार्वती ने रेत से शिवलिंग का निर्माण कर रात भर जागरण करते हुए आराधना मग्न रही थी| उनकी इस कठिन तपस्या को देखकर भगवान शिव ने दर्शन दिए और माता के इच्छानुरूप उनको पत्नी के रूप में स्वीकार करने को तैयार हुए और कुछ समयोपरांत उनका विवाह हुआ|
यहाँ पर भगवान शिव ने माता पार्वती से कहा था - हे पार्वती, भाद्रपद शुक्ल पक्ष तृतीया को हस्त नक्षत्र में आपने जो आराधना करते हुए व्रत किया इसके परिणाम स्वरुप ही हमदोनो का विवाह संभव हुआ| इसलिए आज के बाद जो भी स्त्री इस व्रत को श्रद्धापूर्वक करेगी उसको भी मनवांछित वर और अखंड सौभाग्य प्राप्त होगा|

लेखिका का परिचय

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मैं बन्दना कुमारी पेशे से एक फिल्मकार हूँ| मुझे कहानियां लिखने का काफी शौक है|

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