जीवित्पुत्रिका या जिउतिया व्रत क्यों मनाई जाती है

जीवित्पुत्रिका या जिउतिया व्रत - तीन दिनों तक चलने वाला यह व्रत महिलाएं वंश वृद्धि और संतान की लम्बी आयु के लिए रखती हैं|

जीवित्पुत्रिका या जिउतिया व्रत कब मनाया जाता है?

जीवित्पुत्रिका या जिउतिया व्रत - हर साल आश्विन महीने के कृष्ण पक्ष की सप्तमी से नवमी तिथि तक मनाया जाता है|

जीवित्पुत्रिका या जिउतिया व्रत कहाँ मनाया जाता है?

जीवित्पुत्रिका या जिउतिया व्रत खास कर बिहार, झारखण्ड और उत्तर प्रदेश में मनाया जाता है|

जीवित्पुत्रिका या जिउतिया व्रत पूजा विधि क्या है?

जीवित्पुत्रिका या जिउतिया व्रत - आश्विन महीने के कृष्ण पक्ष की सप्तमी से नवमी तिथि तक मनाया जाता है| महिलाएं वंश वृद्धि और संतान की लम्बी आयु के लिए तीनों दिन पितरो की पूजा करती हैं| इस व्रत की शुरुआत आश्विन महीने के कृष्ण पक्ष की सप्तमी के दिन नहाय खाय से होता है, जिसमे झिंगुनी की सब्जी, कर्मी और नोनी की साग, मक्के और मड़ुआ की रोटी, झोर भात, खीर पूरी और अन्य भोजन इच्छानुसार करते हैं| नमकीन या तीखा भोजन वर्जित होता है| सप्तमी के दिन के बाद रात को सूर्योदय से पहले ओठगन करते हैं| ओठगन करने से पहले महिलाएं चील और सियार को भी खीरा और अंकुरित अनाज देती है| दायें हाथ से आगे की ओर चील को और बायें हाथ से पीछे की ओर सियार को भोजन देती है और कहती हैं कि चील के जैसा सब कोई और सियार के जैसा कोई नहीं| इस व्रत के सम्बन्ध में चील और सियार की एक पौराणिक कथा है जो आपको आगे पढ़ने को मिलेगा| ओठगन में मीठा या फलाहार एवं चाय पानी भी पीते हैं| खीरा और पान विशेष तौर पर खाया जाता है| एकदम हल्का भोजन किया जाता है जिससे अष्टमी के दिन मुंह में खट्टी डकार या पानी नहीं आना चाहिए, अगर किसी व्रती के मुंह में पानी या खट्टी डकार आ जाता है तो उस परिस्थिति में व्रती अष्टमी की रात में अपना व्रत तोड़ लेती हैं जिसे खर जिउतिया कहा जाता है| अष्टमी को महिलायें निराहार एवं निर्जला उपवास रखती हैं, इस दिन किसी भी प्रकार का भोजन या पानी ग्रहण करना पूर्णतः निषेध होता है| इस दिन उपवास के दौरान महिलाएं जीवित्पुत्रिका या जिउतिया व्रत कथा भी सुनती हैं| कई बार महिलाओं को चालीस घंटे तक भी निर्जला रहना पड़ जाता है जैसे की इस बार बत्तीस घंटे का उपवास रखना है| नवमी तिथि आने पर महिलाएं व्रत तोड़ती हैं जिसे पारण कहा जाता है| पंचांग के अनुसार एक नियत समय पर पारण होता है| पारण में सबसे पहले महिलायें खीरा और अंकुरित कुशिया केराव यानी छोटी मटर, तुलसी पत्ता और गंगा जल ग्रहण करती हैं, उसके बाद इच्छानुसार अन्य भोजन ग्रहण करती हैं|

जीवित्पुत्रिका या जिउतिया व्रत की पौराणिक कथा

गन्धर्वों के राजकुमार जीमूतवाहन बड़े ही उदार और परोपकारी प्रवृति के थे। वृद्धावस्था में जीमूतवाहन के पिता जीमूतवाहन को राजसिंहासन पर बैठा कर वानप्रस्थ आश्रम चले गए| जीमूतवाहन का मन राज-काज में एकदम ही नहीं लगता था। वे अपना राज पाठ अपने भाइयों को सौंप कर पिता की सेवा करने के लिए वन चले गए। जहाँ पर जीमूतवाहन का विवाह मलयवती नामक राजकन्या से हुआ। एक दिन वन भ्रमण के क्रम में जीमूतवाहन को एक वृद्धा विलाप करते हुए दिखी| पूछने पर वृद्धा ने कहा – मैं नागवंश की स्त्री हूं और एक ही पुत्र की माँ हूँ। नागवंश और पक्षिराज गरुड के बीच एक प्रतिज्ञानुसार प्रतिदिन भक्षण हेतु एक नाग भेजा जाता है। उसी क्रम में आज मेरे पुत्र शंखचूड की बलि का दिन है। यह कह कर वृद्धा रोने लगी| जीमूतवाहन ने वृद्धा को चुप कराते हुए आश्वासन दिया कि मैं तुम्हारे पुत्र के प्राणों की रक्षा करूंगा| इतना कहकर जीमूतवाहन ने शंखचूड के हाथ से लाल कपडा ले लिया और स्वयं उस लाल कपड़े को लपेटकर गरुड को बलि देने के लिए चुनी हुई वध्य-शिला पर लेट गए। नियत समय पर गरुड लाल कपडे में ढंके जीमूतवाहन को बड़े ही वेग से अपने पंजे में दबोचकर पहाड की चोटी पर ले गए। मृत्यु के सामने भी प्राणी को निर्भय देखकर गरुड जी बड़े आश्चर्य में पड गये और उनके बारे में पूछा तब जीमूतवाहन ने सारा कहानी गरुड़ जी को सुनाया. गरुड जी उनकी बहादुरी और दूसरों के लिए स्वयं का बलिदान देने की हिम्मत से प्रसन्न होकर जीमूतवाहन को जीवन-दान दे दिया और साथ ही नागों की बलि न लेने के लिए प्रतिज्ञाबद्ध भी हुए। जीमूतवाहन के अदम्य साहस के कारण ही नाग-जाति की रक्षा हुई और तभी से पुत्र की सुरक्षा हेतु जीमूतवाहन की पूजा की प्रथा शुरू हुई।|

एक अन्य कथानुसार महाभारत युद्ध में अपने पिता की मृत्यु से नाराज होकर अश्वत्थामा एक रात को पांडवों को शिविर में घुस कर सोते हुए पांच लोगों को पांडव समझ कर मार डाला| मरने वाले पांचो पांडव ना होकर द्रोपदी की पांच संताने थी| इस कारण पांडवो ने अश्वत्थामा को बंदी बनाकर उसकी दिव्य मणि छीन ली| उसके बाद अश्वत्थामा ने उत्तरा की गर्भ में पल रहे संतान को मारने के लिए ब्रह्मास्त्र का प्रयोग किया| ब्रह्मास्त्र को निष्फल करना संभव नहीं था लेकिन भगवन श्री कृष्ण ने अपने तपोबल से उत्तरा की गर्भ में मृत संतान को गर्भ में पुनर्जीवित कर दिया| गर्भ में मरकर पुनः जीवित होने के कारण ही उसका नाम जीवित्पुत्रिका पड़ा जो आगे चल कर राजा परीक्षित बने| तभी से जीवित्पुत्रिका व्रत का प्रचलन हुआ|

जीवित्पुत्रिका व्रत का महत्व

एक समय की बात है किसी वन में मनुष्य जीवित्पुत्रिका व्रत विधिपूर्वक कर रहे थे| वन में रहने वाले चील और सियार घूमते घूमते वहां पहुंचे|| व्रत के दौरान चील ने श्रद्धापूर्वक विधि विधान को देखा और कथा सुनी, वहीँ पर सियार ने अनमने ढंग से व्रत का विधि विधान देखा और कथा भी अनमने मन से सुनी| इस वजह से आगे चल कर मनुष्य और चील की संतानों को किसी भी प्रकार की हानि नहीं हुई जबकि सियार की कोई भी संतान जीवित नहीं बची| जिस वजह से इस व्रत का बहुत अधिक महत्व है|

लेखिका का परिचय

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मैं बन्दना कुमारी पेशे से एक फिल्मकार हूँ| मुझे कहानियां लिखने का काफी शौक है|

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