तुलसी की उत्पत्ति

तुलसी की उत्पत्ति देव और दानवों द्वारा किये गए समुद्र मंथन के समय जो अमृत धरती पर छलका उसी से तुलसी की उत्पत्ति हुई| ब्रह्मदेव ने उसे भगवान विष्णु को सौंपा| तुलसी शाकीय तथा औषधीय गुणों से भरपूर पौधा है जिसे हिन्दू धर्म में बहुत ही पवित्र माना जाता है| यह एक से तीन फ़ीट ऊंचा होता है और झाड़ी के रूप में उगता है| इसके पत्ते एक से दो इंच तक लम्बे होते हैं और इस पर दिल के आकार के फूल चक्र में खिलते हैं| यह लगभग दो से तीन साल तक हरा भरा रहता है लेकिन उसके बाद मुरझा जाता है और इसके पत्ते झरने लगते हैं| भारत में प्रायः हर घर के आँगन में तुलसी का पौधा पाया जाता है|

तुलसी के प्रकार

तुलसी की बहुत सी प्रजातियां पायी जाती है जिसमे ओसमिम केक्टम को सबसे पवित्र माना जाता है जो की दो प्रकार की है| श्री तुलसी जिसके पत्ते हरे रंग के होते हैं और शाखाएं श्वेत रंग की होती है| कृष्ण तुलसी जिसके पत्ते बैंगनी रंग के होते हैं और शाखाएं काले रंग की होती है|

तुलसी का महत्व

तुलसी के पौधे का प्राचीन काल से ही हमारे जीवन में बहुत महत्व रहा है| भगवन विष्णु योगेश्वर कृष्ण और पांडुरंग के पूजन के समय तुलसी पत्रों की हर उनकी प्रतिमाओं को अर्पित किया जाता है| भगवान श्री कृष्ण को तुलसी अत्यंत प्रिय है| स्वर्ग रत्न, मोती से बने पुष्प यदि भगवान श्री कृष्ण को चढ़ाया जाये तो भी तुलसी पत्र के बिना वे अधूरे हैं| श्रीकृष्ण अथवा विष्णुजी तुलसी पत्र के बिना नैवेद्य स्वीकार नहीं करते हैं| कार्तिक मास में तुलसी पत्र से विष्णु भगवान का पूजन करने का एक अलग ही महत्व है| तुलसी का प्रतिदिन दर्शन करना पापनाशक होता है तथा पूजन करने से मोक्ष की प्राप्ति होती है| देवपूजा और श्राद्धकर्म में तुलसी आवश्यक है| तुलसी पत्र से पूजा करने से व्रत, यज्ञ, जप, हवन करने का पुण्य प्राप्त होता है| तुलसी देवी समान पूजनीय है और ऐसे आयुर्वेद में भी विशेष स्थान प्राप्त है | तुलसी से विभिन्न प्रकार की दवाइयां बनायीं जाती है और तुलसी का काढ़ा पीने से सर दर्द, खांसी, जुकाम और बुखार आदि में राहत मिलती है|

तुलसी विवाह कब किया जाता है?

कार्तिक शुक्ल पक्ष एकादशी को देवउठनी एकादशी या प्रबोधनी एकादशी के नाम से जाना जाता है| इस दिन भगवान विष्णु और सभी देवता अपनी योगनिद्रा से जागते हैं| इस दिन भगवान विष्णु की विशेष रूप से पूजा की जाती है और उनके स्वरुप शालिग्राम और तुलसी का विवाह कराया जाता है|

तुलसी विवाह का महत्व

देवउठनी एकादशी के दिन शालिग्राम और तुलसी जी का विवाह कराने से कन्यादान के बराबर फल मिलता है | इस दिन से ही विवाह, मुंडन और अन्य मांगलिक कार्य शुरू हो जाते हैं| शालिग्राम और तुलसी का विवाह भगवान विष्णु और महालक्ष्मी का ही प्रतीकात्मक विवाह माना जाता है|

तुलसी उद्यापन

कार्तिक मास का महीना स्नान, व्रत और तप के लिए सर्वोत्तम है| महिलाएं बारह वर्ष तक कार्तिक मास में प्रातः स्नान करने के बाद दान - व्रत कर तेरहवें वर्ष में पुरे विधि विधान से उसका उद्यापन करती हैं|

तुलसी उद्यापन विधि

कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष चतुर्दशी को व्रत का उद्यापन किया जाता है| इस दिन तुलसी के पौधे के ऊपर सूंदर मंडप की रचना की जाती है जिसमे की चार दरवाज़े होते हैं| मंडप पर पंचरत्न से युक्त सूंदर कलश की स्थापना की जाती है और कलश के ऊपर फल रखा जाता है| इस मंडप में महालक्ष्मी और चतुर्भुज नारायण भगवान की मूर्ति स्थापित कर उनका विधिपूर्वक पूजन किया जाता है| अंत में दान पुण्य कर एवं ब्राह्मणों को भोजन कराकर इस व्रत का उद्यापन किया जाता है|

लेखिका का परिचय

मैं ज्योतिका, बेगूसराय से हूँ

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